जरा खिसकिये हमे बैठना है। मै खिसका ही था कि उधर से खिसको सामने एक नौजवान चिल्लाकर बोल रहे थे। हमने भी कहा, आप ही इधर बैठ जाइये। फिर वो कुछ बुदबुदाये और आकर बैठ गए। मै उठकर अगली सीट पर चला गया। क्योंकि, हमारा स्टेशन आने वाला था। इसी बीच दोस्त का फोन आ गया और हमारी बात होने लगी उसने कुछ कहा तो हमारे मुंह से निकल गया कि हिटलर ने लिखा है कि किसी भी मुनष्य को आप इसी धरती पर स्वर्ग और नर्क का एहसास करा सकते हो। हमारा ये इशारा वो महिला समझ गई। इतने में आवाज आई बिकू और हमारे दोस्त खड़े थे उतरते ही एक-दूसरे से गले मिले। अचानक सर पर नजर पड़ी सर आप! हमने भी सोचा विवेक तुम से मिल ही लेते हैं। तुम जब भी आते हो मिल के जाते हो तो इस बार हम भी मिल लेते हैं। हमने सर को प्रणाम कि और चलने ही वाला था कि एक बार फिर से उस महिला की ओर देखा तो जैसे लगा वो कुछ कहना चाह रही है। शायद अपने अफसर के बर्ताव पर माफी मांगना चाह रही है, लेकिन ट्रेन चल चुकी थी और वो हमारा इशारा समझ गई थी।
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बुधवार, 7 सितंबर 2016
गुरुवार, 16 जून 2016
वो मेरी #अध्यापिका
शहर-दर-शहर बदल जाते हैं
लोग मिलते हैं और बदल जाते हैं
नहीं बदलती हैं तो बस वो यादें
जो वर्तमान से अतीत में खींच ले जाती हैं
दिसंबर 2011 साइकिल से चार किलोमीटर चलाकर अपनी इंस्टीट्यूट पहुंचा। आज कुछ ज्यादा उत्साहित था, क्योंकि मेरी नई अध्यापिका आज हम लोगों से रू-ब-रू होने वाली थी। हम लोगों का बैच सुबह 7:30 बजे का और ठंड का मौसम। हम सभी मैं और मेरे दोस्त कक्षा में उपस्थित हुए और शुरू हुआ परिचय का दौर। इसके सभी ने अध्यापिका जी से एक गाने का निवेदन किया, लेकिन उन्होंने एक शर्त ये रख दी कि मैं सभी के गाने के बाद गाऊंगी। अब सवाल यह था कि पहले गाए कौन? पहले हमी को गाना पड़ गया और इसके बाद मेरे दोस्तों ने बारी-बारी सके गीत की प्रस्तुति दी। इसके बाद हमारी अध्यापिका जी एक दिन आप हमको मिल जाएंगे की प्रस्तुति दी। कंप्यूटर की कक्षाएं लगभग दो महीने तक चलीं और एक हम लोगों को पता चला कि अध्यापिका जी संस्थान छोड़ के कहीं नई जगह जा रही हैं हम लोगों में उदासी छा गई। ऐसा नहीं कि उनकी नई पारी से हमारे दोस्तों और हमें खुशी नहीं थी। थी, बेशक, लेकिन उनका एक दोस्त की तरह व्यवहार हम लोगों के उदासी का कारण था। हम सब जब वो पढ़ाती थी तो इतने सवाल दाग देते थे कि उनकी जगह कोई और होता तो शायद क्लास छोड़कर चला जाता, लेकिन वो बारी-बारी से सबके सवालों के जवाब देती।
आप उनको देखकर नहीं बता सकते थे कि वे अध्यापिका है। एक दुबली-पतली सी लड़की और वह भी पंजाब और हमारे नवाबों के शहर में पढ़ाती हो। अक्स वो कह देती थी तु सवाल पूछने से पहले मुस्कुराने क्यों लगते हो इसके आगे मैं कुछ बोल नहीं पाता था। वो बोलती थी कि तुम लोगों सवाल करने की कोशिश ही नहीं करते।
आखिर वो दिन आ ही जब हम लोगों ने उनको विदाई दी। हम सभी ने डिमांड की कि जलेबी के साथ समोसे और दही आना चाहिए। उन्होंने हम सभी की मांग मान ली। सभी ने खूब लुत्फ उठाया। उन्होंने सभी को जलेबी जो एक बार वितरित करने के बाद बच गई थी दोबारा देने लगी तो सभी ने हमारी तरफ इशारा किया और अध्यापिका जी बोली एक और लो और मैं न करता रहा। आज सोचता हूं ले लिया होता तो कुछ और मिठास रह जाती। बस, आप जहां भी रहे खुश रहे। हम लोग आपको को याद करते रहेंगे।
लोग मिलते हैं और बदल जाते हैं
नहीं बदलती हैं तो बस वो यादें
जो वर्तमान से अतीत में खींच ले जाती हैं
दिसंबर 2011 साइकिल से चार किलोमीटर चलाकर अपनी इंस्टीट्यूट पहुंचा। आज कुछ ज्यादा उत्साहित था, क्योंकि मेरी नई अध्यापिका आज हम लोगों से रू-ब-रू होने वाली थी। हम लोगों का बैच सुबह 7:30 बजे का और ठंड का मौसम। हम सभी मैं और मेरे दोस्त कक्षा में उपस्थित हुए और शुरू हुआ परिचय का दौर। इसके सभी ने अध्यापिका जी से एक गाने का निवेदन किया, लेकिन उन्होंने एक शर्त ये रख दी कि मैं सभी के गाने के बाद गाऊंगी। अब सवाल यह था कि पहले गाए कौन? पहले हमी को गाना पड़ गया और इसके बाद मेरे दोस्तों ने बारी-बारी सके गीत की प्रस्तुति दी। इसके बाद हमारी अध्यापिका जी एक दिन आप हमको मिल जाएंगे की प्रस्तुति दी। कंप्यूटर की कक्षाएं लगभग दो महीने तक चलीं और एक हम लोगों को पता चला कि अध्यापिका जी संस्थान छोड़ के कहीं नई जगह जा रही हैं हम लोगों में उदासी छा गई। ऐसा नहीं कि उनकी नई पारी से हमारे दोस्तों और हमें खुशी नहीं थी। थी, बेशक, लेकिन उनका एक दोस्त की तरह व्यवहार हम लोगों के उदासी का कारण था। हम सब जब वो पढ़ाती थी तो इतने सवाल दाग देते थे कि उनकी जगह कोई और होता तो शायद क्लास छोड़कर चला जाता, लेकिन वो बारी-बारी से सबके सवालों के जवाब देती।
आप उनको देखकर नहीं बता सकते थे कि वे अध्यापिका है। एक दुबली-पतली सी लड़की और वह भी पंजाब और हमारे नवाबों के शहर में पढ़ाती हो। अक्स वो कह देती थी तु सवाल पूछने से पहले मुस्कुराने क्यों लगते हो इसके आगे मैं कुछ बोल नहीं पाता था। वो बोलती थी कि तुम लोगों सवाल करने की कोशिश ही नहीं करते।
आखिर वो दिन आ ही जब हम लोगों ने उनको विदाई दी। हम सभी ने डिमांड की कि जलेबी के साथ समोसे और दही आना चाहिए। उन्होंने हम सभी की मांग मान ली। सभी ने खूब लुत्फ उठाया। उन्होंने सभी को जलेबी जो एक बार वितरित करने के बाद बच गई थी दोबारा देने लगी तो सभी ने हमारी तरफ इशारा किया और अध्यापिका जी बोली एक और लो और मैं न करता रहा। आज सोचता हूं ले लिया होता तो कुछ और मिठास रह जाती। बस, आप जहां भी रहे खुश रहे। हम लोग आपको को याद करते रहेंगे।
रविवार, 5 जून 2016
सफर
रोज की तरह मैं आज भी दफ्तर जाने को तैयार हो रहा था। उस दिन मुझे रोज की अपेक्षा पहले निकलना था, क्योंकि मैं जिसके साथ जाता था तो कहीं गए हुए थे और मैं अकेला था तो ऑटो का ही सहारा था, इसलिए पहले निकला और ऑटो पकड़कर समय पर दफ्तर पहुंच गया गया। रोज की तरह उस दिन भी मैंने कार्य किया। हमारे सहयोगी ने हमसे पूछा किस ट्रेन जाना है तब हमें होश आया की अभी तो ट्रेन देखी ही नहीं कितने बजे है। खैर, अब मैं ट्रेन का शेड्यूल देखने लगा बाकी बचा काम हमारे सहयोगी ने पूरा कर लिया। अभी मैं ट्रेन का शेड्यूल देख ही रहा था कि मुझे याद आया कि अवकाश के लिए मेल भी भेजना है तो पहले मैंने ट्रेन का शेड्यूल देखने की बजाय छुट्टी का मेल भेजना उचित समझा और मैंने अपने सीनियर महोदय के पास मेल भेज कर ट्रेन का शेड्यूल देख लिया।
मैं अपने सहयोगी के साथ रोज की तरह अपने गंतव्य को निकला, लेकिन रात के करीब 12 बजने की वजह से मुझे ऑटो नहीं मिला तो मेरे सहयोगी ने मुझे अपनी गाड़ी से मुरादाबाद रेलवे स्टेशन तक छोड़कर वह वापस लौट गए। हर बार की तरह इस बार भी जनरल से जा रहा था, इसलिए टिकट लेने के लिए लाइन में लग गया।
मुरादाबाद से लखनऊ की दूरी महज 343 किलोमीटर होने के कारण मैं भी स्लीपर के डिब्बे में बैठ गया। ट्रेन भी लखनऊ मेल मिल गई थी, जो कि भोर में मुझे लखनऊ उतार दी। इतनी दूरी में किसी टीईटी न आने से मैंने अपने पेनल्टी के पैसे जरूर बचा लिए थे। सोमवार की सुबह मैं अपने गृहनगर मोहम्मदपुर बाराबंकी पहुंच गया। सब लोग मुझे देखकर चौंक गए, क्योंकि मैं हमेशा की तरह इस बार भी बिन बताए जो पहुंचा था। खैर, जो भी मैंने घर पर तीन दिन बिताए और रिश्तेदारी में भी घूम आया।
मुरादबाद लौटने से एक दिन पहले मैं लखनऊ के लिए निकल लिया। मैं अपने मित्रों से मिला, जिनसे मिलकर बड़ी खुशी हुई। हां, धूप तो बहुत तेज थी, क्योंकि मई का महीना और ऊपर से मिरगिसरा नक्षत्र हो तो आप गर्मी का अंदाजा लगा सकते हैं क्या होगी। मिलते-मिलाते मैं अपने पापा के मामा के यहां रुका और अगली सुबह गरीब रथ से मुरादाबाद को फिर लौट पड़ा। हां, सफर में मुझसे पानी की बोतल एक भाई साहब के सिर पर गिर गई, लेकिन भाई ने कहा कोई बात नहीं तब जाके मैंने राहत की सांस ली। इस सफर में मैंने एक यात्री मित्र से हॉलीवुड की एक एनेमी द गेट्स फिल्म भी ली। ऐसे ही कुछ दोस्त जो उस सफर में मिले और मैं उनके साथ फिर मुरादाबाद पहुंच गया। और वो मेरे सफर मित्र जो सफर में थे आगे के सफर को चल दिए। मैं फिर अवकाश के इंतजार में रहूंगा, और एक सफर को फिर निकलूंगा, जो न कि खत्म होगा न ही उबाऊ होगा। होगा तो सिर्फ और सिर्फ सफर का रोमांच।
मैं अपने सहयोगी के साथ रोज की तरह अपने गंतव्य को निकला, लेकिन रात के करीब 12 बजने की वजह से मुझे ऑटो नहीं मिला तो मेरे सहयोगी ने मुझे अपनी गाड़ी से मुरादाबाद रेलवे स्टेशन तक छोड़कर वह वापस लौट गए। हर बार की तरह इस बार भी जनरल से जा रहा था, इसलिए टिकट लेने के लिए लाइन में लग गया।
मुरादाबाद से लखनऊ की दूरी महज 343 किलोमीटर होने के कारण मैं भी स्लीपर के डिब्बे में बैठ गया। ट्रेन भी लखनऊ मेल मिल गई थी, जो कि भोर में मुझे लखनऊ उतार दी। इतनी दूरी में किसी टीईटी न आने से मैंने अपने पेनल्टी के पैसे जरूर बचा लिए थे। सोमवार की सुबह मैं अपने गृहनगर मोहम्मदपुर बाराबंकी पहुंच गया। सब लोग मुझे देखकर चौंक गए, क्योंकि मैं हमेशा की तरह इस बार भी बिन बताए जो पहुंचा था। खैर, जो भी मैंने घर पर तीन दिन बिताए और रिश्तेदारी में भी घूम आया।
मुरादबाद लौटने से एक दिन पहले मैं लखनऊ के लिए निकल लिया। मैं अपने मित्रों से मिला, जिनसे मिलकर बड़ी खुशी हुई। हां, धूप तो बहुत तेज थी, क्योंकि मई का महीना और ऊपर से मिरगिसरा नक्षत्र हो तो आप गर्मी का अंदाजा लगा सकते हैं क्या होगी। मिलते-मिलाते मैं अपने पापा के मामा के यहां रुका और अगली सुबह गरीब रथ से मुरादाबाद को फिर लौट पड़ा। हां, सफर में मुझसे पानी की बोतल एक भाई साहब के सिर पर गिर गई, लेकिन भाई ने कहा कोई बात नहीं तब जाके मैंने राहत की सांस ली। इस सफर में मैंने एक यात्री मित्र से हॉलीवुड की एक एनेमी द गेट्स फिल्म भी ली। ऐसे ही कुछ दोस्त जो उस सफर में मिले और मैं उनके साथ फिर मुरादाबाद पहुंच गया। और वो मेरे सफर मित्र जो सफर में थे आगे के सफर को चल दिए। मैं फिर अवकाश के इंतजार में रहूंगा, और एक सफर को फिर निकलूंगा, जो न कि खत्म होगा न ही उबाऊ होगा। होगा तो सिर्फ और सिर्फ सफर का रोमांच।
बुधवार, 18 मई 2016
मैं और #मेरा कमरा
रात के करीब 12 बजे रहे होंगे। एक लंबी सी सरसराहट घुट अंधेरे को चीरती हुई सुनाई दी। सामने देखा तो एक दुबला-पतला सा छरहरा सा लड़का उस ठंड की रात में एक पेड़ के नीचे खड़ा था। जब मैं उसके पास गया तो देखकर हैरान रह गया उसके पास ठंड से बचने के लिए न कोई कपड़ा था और न ही उसके पास जूते-चप्पल। मैंने उससे पूछा कहां से आए हो और जाना कहां है, वह कंपकपाती आवाज में बोला बाबू मेँ यही आपके गांव नदिया से आया हूं और और मुझे जाना कहीं नहीं बस मैं आसरा ढूंढ रहा था तो ठंड ने मुझे यहां रुकने को मजबूर कर दिया। इतनी उसकी बात सुनते ही मैं उसको साथ लेकर अपने कमरे पर ले आया, गैस जलाई और गरमा-गरम चाय बनाई। मैंने उसकी तरफ चाय का प्याला बढ़ाया तो वह किसी तरह से कंपकपाते हाथों से उसने वह चाय का प्याला पकड़ा। जब वह अंगीठी से अपनी ठंड को थोड़ा सा दूर कर लिया तो मैंने उससे पूछा क्या करते हो तो उसने एक आशा की नजर से देखता हुआ बोला बाबू मैं ज्यादा पढ़ा-लिखा नहीं हूं, इसलिए कहीं भी जाता हूं तो मुझसे सब यही पूछ हैं कितनी पढ़ाई की है अब आप ही बताएं जिसका बचपन ही कचरे से पेट भरने का साधन ढूंढता रहा हो वो कैसे पढ़ाई कर पाए। मैं थोड़ा सा रुका और फिर उससे पूछा क्यों कचरे से पेट भरने का क्या मतलब तो उसने साहस जुटाते हुए बोला मुझे याद नहीं कि मैरे मां-बाप कब गुजर गए और मेरा बचपन कैसे बीता। हां, यह जरूर याद है कि जब मुझमें समझ आई तो मैं कचरा एकत्रित कर अपना पेट भर लेने लगा था। यह सुनते ही मेरी आंखे ढबढबा आईं। मैंने उसको कुछ गरम कपड़े और कुछ खाने का सामान दिया। खाना खाने के बाद उसको सोने के लिए कहा तो वह कहने लगा पता नहीं बाबू क्यों आप ऐसे पहले इंसान मिले जो कि अन्य कोई बात पूछ बगैर आसरा दिया नहीं तो इस ठंडक में मैं शायद मर ही जाता। अब वह सोने चला गया था, अगली सुबह मैं उससे पहले उठता कि वह मेरे कमरे से जा चुका था और वह जरूरता की सारी चीजे वही हमारे पास छोड़ गया था। बस उसकी कुछ क्षण की यादे मेरे पास बची थी और कुछ बचा था तो सिर्फ मैं और मेरा कमरा जो एक सरसराहट में अगली रात का इंतजार में बैठ गया थे।
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