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मंगलवार, 15 दिसंबर 2020

न हम उनके जैसे थे न हैं और न होंगे

 जब उनसे रुखसत हुए 

हाल ए दर्द लिए रुखसत

सोचा दर्द बेच आएं बाजार में

हम भी गए बाजार में

बाजार जख्म खानेवालों से भरा मिला

अपना दर्द लिए ही लौट आये 

साथ ही एक और दर्द से मुलाक़ात हो गई

अब तो दर्द में ही जीने का सफर चल पड़ा

अब तो दर्द दे भी जाए कोई तो फर्क नहीं पड़ता

न हम उनके जैसे थे न हैं और न होंगे

फिर भी उनसे किसी मोड़ पर मुलाक़ात होगी तो नजरें जरूर मिलाएंगे


सोमवार, 24 अगस्त 2020

सदा खुश है वो

सुकून नहीं है इस हसीं दुनिया

आजकल हवा भी बदली है

घिरे हैं यहां बहुतों से

पर खुद को अकेला पाते हैं

उम्मीद जो पाले हैं दूसरे से

यकीन मानिए रोते होंगे रोज

दरअसल ये जो दिखती है दुनिया

ख़ुशी और गम दोनों समेटे है

दर्द हो तो पल भर के लिए रो लो

पर मुस्कुराना क्यों छोड़ों

बहुत से हैं जो भूखे सोते हैं

आप तो खा के सोते हैं

दोष न किसी का यहाँ

बस किरदार निभा रहे सभी

जो किरदारों में ढल गया

सदा खुश है वो

गुरुवार, 7 फ़रवरी 2019

मैं पथिक बस सफर का हूं



मैं पथिक बस सफर का हूं
हां मुझमें चंचलता भी है और धैर्य
शताब्‍दी तक मुझमें जीने की पिपासा नहीं
बस इक पल में सारी उम्र जीना चाहता हूं
खुले मन वाला हूं
जो तुम्‍हें पसंद आए वो पथिक हूं
खुद के अंदर इक दुनिया बसाए बैठा हूं
हर रोज मिलता हूं उनमें रहने वालों से
कुछ दो चार अपने टाइप के भी हैं
कुछ दिलनशीं कुछ दिलदार भी हैं
सफर में खुशनुमा पल समेट कर चलता हूं
चलता हूं तो सर झुका के चलता हूं
आज इक सफर में हूं
शायद कल भी सफर में रहूं

शुक्रवार, 23 मार्च 2018

हां मैं वेश्‍या हूं, हां मैं वेश्‍या हूं

हां मैं #वेश्‍या हूं, हां मैं वेश्‍या हूं
तुम जैसे रोज आते हैं मेरे #कोठे पर अपनी #हवस मिटाने
कुछ मानसिक विक्रतियों से घिरे तो कुछ अपना दर्द भुलाने
एक नहीं तुम जैसे अनेक के साथ रोज हम बिस्‍तर होती हूं
हम सिर्फ अपना जिस्‍म बेचती हूं और तुम हर रोज अपनी आत्‍मा बेंच कर जाते हो
माहवारी में भी तुम जैसे दर्द को नहीं समझ पाते और हम उसे दवा की तरह पी जाती हूं
मेरे यहां धर्मों का आडम्‍बर नहीं होता
कोठे के बाहर सारे धर्म छूट जाते हैं  
मेरे यहां एक से आते हैं जिनकी औकात एक ग्राहक सी होती है
और फिर जाते जाते वेश्‍या गाली भी दे जाते हो

गुरुवार, 14 सितंबर 2017

हिंदी खुद को लड़ता पाती है

कौन धरा पर यह किसको भाति है
हिंदी की बिंदी खुद अपना #अस्तित्व बचाती है
जिस #जुबान पर #मॉम से पहले #माँ आती है
ऐसे देश में हिंदी खुद को लड़ता पाती है
#फ़िल्मी #दुनिया हिंदी से ही #मालामाल बनती है
पर इन #फिल्मकारों को हिंदी बोलने में शर्म महसूस होती है
#विद्या धन आलय में जिससे पैसा आये वह #भाषा प्यारी है
#अमेरिका, #जापान, #चीन अपनी #मातृभाषा पर इतराते हैं
इक भारतवासी हैं जो #हिंदीवासी कहलाने में लज्जित महसूस करते हैं
बड़े बड़े #लेख छपे #अखबारों में
हमने आज सुना है हिंदी का भी दिन होता है हिंदी वालों में
गर्व से कहो हम हिंदीवासी हैं

सोमवार, 24 जुलाई 2017

न था मालूम माँ फिर न आऊंगा

पतझड़ बीता #सावन आया
बारिश के संग मेघों का आमंत्रण आया
पनघट से #पनिहारिन घर को आई
#बेटा जो #परदेसी हो गइल है
हर शाम माँ बेटे का इन्तजार करती है
घर से कहकर निकला था जल्दी आऊंगा
न था मालूम माँ फिर न आऊंगा
तुझसे जो कहकर आया था माँ
मैं वैसा न बन पाया था माँ
आने को जाने को अब #याद नहीं रहता #माँ
बस तुझको इक इक #पल याद करके जी लेता हूँ माँ

शुक्रवार, 16 जून 2017

क्या कभी सोचा है उनकी भी इक ज़िन्दगी होती

कभी सोचा है इक #उम्र ढलने के बाद क्या होता है उनका
वो जो #मज़बूरी में अपना #जिस्म बेचती हैंक्या कभी सोचा है उनकी भी इक ज़िन्दगी होतीकैसे उनको हीं समझा जाने लगता है
कैसे ज़िन्दगी जीती होंगी सोचा है तुमने
बस तुम तो #वासना की आग में जलते रहे हो
जिसने उस आग में दूसरों को जलाया
क्या कभी सोचा है उनकी भी इक ज़िन्दगी होती
बस तुम #लोगों ने वेश्या का नाम देकर उससे जीवन छीन लिया
और इस #दुनिया ने उसे #वेश्या से ज्यादा कुछ नहीं समझा

शनिवार, 3 जून 2017

हमारी गली के मोड़ पर वो मकान आता है

#हमारी #गली के मोड़ पर वो #मकान आता है
निकलते हैं जब भी उनका #एहतराम आता है
#शर्म से #नज़रे झुका लेते हैं #उनको #देखकर
जब निकलते #वक्त वो अपनी #छत पर आता है

शनिवार, 22 अप्रैल 2017

आनंदित हो वह मधुमास में उड़ता रहा

आनंदित हो वह मधुमास में उड़ता रहा
वह परिंदा शहर-दर-शहर घुमता रहा
कुछ छोड़ा तो कुछ अपना लिया था हर शहर को
शहर छोड़ने पर वह परिंदा फड़फड़ा रहा था
लब्ज उसके कह रहे थे हर इक कहानी को
शहर छोड़ उड़ चलने की कहानी को
बस नए शहर की तलाश हर वक्त रहती है
न जाने क्यों उड़ने की बेकरारी सी रहती है

मंगलवार, 21 मार्च 2017

बहाने हजार तलाशता है

बहाने हजार तलाशता है
वह बच्चा बगले झांकता है
कई दिनों से न खाया है
कई रात बिन सोये गुजारा है
गालियों से उसने अपनी भूख मिटाई है
तपती सड़कों पर वह नंगे पैर चला है
वह बच्चा आज पहाड़ का हौसला तोड़ने चला है
पथ पर था जो वह पीछे छोड़ दिया है
वह नया इतिहास लिखने आगे चला है
वह बच्चा आज अपनी जिद पर अड़ा है
बहाने हजार तलाशता है
वह बच्चा बगले झांकता है 

मंगलवार, 31 जनवरी 2017

रात जैसे ठहरी थी सुबह के इंतजार में

रात जैसे ठहरी थी सुबह के इंतजार में
साखों पर ओस थी पिघलने के इंतजार में
हम घर से न निकले आपके इंतजार में
बक बक करने को जुबां थी इंतजार में
चलती रही घड़ी की सुई समय के इंतजार में
हम रुके नहीं खो जाने के इंतजार में

बुधवार, 25 जनवरी 2017

रहते हैं लाख बंदिशों में जो

सर झुक जाता है तेरी बंदगी में ऐ रब
फरेब का चादर ओढ़कर एक पल न चल पाता हूं
रहते हैं लाख बंदिशों में जो
ख्वाहिशों के झोंको में उड़ जाया करते हैं
तमन्नाएं छटपटाती हैं दिल के बंद दरवाजे के पीछे
दिल के दरवाजे के खुलने तक तमन्नाएं मर जाया करती है
हर रोज जिंदगी के कुछ पल मांगता हूं उस रब से जीने के
कुछ खोने के डर में ये पल बीत जाया करते हैं

शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

न जाने कहां से आया

इतनी बेरहम थी दुनिया
मेरा दर्द न आंक सकी
कुछ पलों को वो साथ रही
फिर हमें वहीं छोड़कर चली गई
न तमाशा हुआ
न कोई शोरगुल हुआ
हम मिले अंजाने शहर में
उन अंजाने हाथों को पकड़ा
एक अंजाना ही सही
पर एक अपनापन दे गया
कुछ पल ही सही
कुछ हंसी दे गया
हमें वह हजारों सपने दिखा गया
इस बेरहम दुनिया में
न जाने कहां से आया
और एक दिन की तरह बीत सा गया

सोमवार, 28 नवंबर 2016

बहती नदी का आज भी किनारा है वो

साथ है मेरे पर अंजान है
वो परिन्दा आजकल बहुत परेशान है
बेबस बेसहारा बेवक्त का मारा है वो
बहती नदी का आज भी किनारा है वो

मंगलवार, 15 नवंबर 2016

हृदय तीर सह जाते हैं

नैन कुछ बोलत नहीं
हृदय तीर सह जाते हैं
आगे चलते-चलते ही वो
पीछे मुड़कर तीर चला जाते हैं
कू-कू कर कोयल वो
सरगर्मी बढ़ा जाती है
पलभर इठलाकर वो
हमको बेचैन बना जाती

मंगलवार, 8 नवंबर 2016

बेवकत बेजुबान सा ये दिल मेरा

बहके कदमें
नजरे झुका लिया करते हैं
तेरे दर्दों से
कुछ लम्हे चुरा लिया करते हैं
बेवकत बेजुबान सा ये दिल मेरा
आपसे मिलते ही नजरे चुरा लिया करते हैं
मैं मुजरिम बन जाऊं
तेरी नजरों के कैद खाने का
इसलिये गलतियां तलाश कर लिया करते हैं

शनिवार, 29 अक्टूबर 2016

फिर क्यों छोड़ जाते हैं हमे मरता इस जमाने में

कौन बांटता एक-दूसरे का दर्द इस जमाने में
सब खोए रहते हैं अपने-अपने अफसाने में
किसी को चार कौड़ी दौलत क्या मिली
भूल जाते हैं बीते हुए लम्हे जमाने में
यहां हर होठों पर खिल उठती है हंसी
अंदर का दर्द कोढ सा बचा रखते हैं जमाने में
हू-ब-हू हम जैसे अनगिनत मिलते हैं
फिर क्यों छोड़ जाते हैं हमे मरता इस जमाने में
बेचैनी इस कदर हमें मारने को दौड़ती
हम हर बार जीत जाते हैं उससे इस जमाने में
हर रोज सुबह जंग होती है मेरी एक नई जिंदगी से
जिंदगी भी हमें छोड़ जाती है इस जमाने के अफसाने में
अब बाबस्ता रहा न कुछ मेरा
अब घुट-घुटकर रोज मरता हूं जमाने में

शनिवार, 22 अक्टूबर 2016

इस जहां में मुकम्मल इश्क नहीं मिलता

इस जहां में मुकम्मल इश्क नहीं मिलता
दौलत मिलती है मगर इश्क नहीं मिलता
दर्पण की तरह इश्क मिलता है
पर टिकने वाला इश्क नहीं मिलता
कुछ पल की खुशी में मुकम्मल इश्क भी लगता
टूटते ही इश्क भी बेवफा लगता
रात-दिन इश्क हमकों सताता
मगर चिराग की अंत पर बेवफा ही मिलता
इस जहां में रोज मिलते हैं इश्क के टूटे चेहरे
मगर इस जहां में मुकम्मल इश्क नहीं मिलता
हो यारो......हो यारो
इस जहां मुकम्मल इश्क नहीं मिलता

गुरुवार, 20 अक्टूबर 2016

आधुनिकता के दौर में सब अंधे हो जाएंगे

हर गली से आवाज उठेगी
हर बस्ती जलेगी
अपने अपनों में स्वार्थ खोजेंगे
आधुनिकता के दौर में सब अंधे हो जाएंगे
तब देखना मेरे देशवासियों
देश के टुकड़े होते देखे जाएंगे

गुरुवार, 13 अक्टूबर 2016

बोतल थी भरी हुई

मैं गुजरा मयखाने के पास से
पिलाने वाला कोई न था
बोतल थी भरी हुई
उसे टटोलने वाला कोई न था