विवेक का आनंद
सोमवार, 28 नवंबर 2016
बहती नदी का आज भी किनारा है वो
साथ है मेरे पर अंजान है
वो परिन्दा आजकल बहुत परेशान है
बेबस बेसहारा बेवक्त का मारा है वो
बहती नदी का आज भी किनारा है वो
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1G से 5G की स्पीड और इंसानों की उजड़ती दुनिया, एक नजर कुछ उठते सवालों पर, क्या इनका जवाब है आपके पास
कपोल भीग जाते हैं
कपोल भीग जाते हैं पर आँख तर नहीं होती जीने को दौड़ता हूँ पर दौड़ नहीं होती सिसकियाँ लेकर सो जाता हूँ सिसकियों में विवेक नहीं होती
इस बार भी खामोशी छाई थी
मुझसे मिलने आना तो रंजिश छोडकर आना मेरे दोस्त
मुझसे मिलने आना तो रंजिश छोडकर आना मेरे दोस्त अगर दिल गवाही न दे तो कतई न आना बस याद कर लेना शाम की वो घडी कि हम दोनों साथ हैं हम दोनो...
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