शनिवार, 22 अप्रैल 2017
मंगलवार, 21 मार्च 2017
बहाने हजार तलाशता है
बहाने हजार तलाशता है
वह बच्चा बगले झांकता है
कई दिनों से न खाया है
कई रात बिन सोये गुजारा है
गालियों से उसने अपनी भूख मिटाई है
तपती सड़कों पर वह नंगे पैर चला है
वह बच्चा आज पहाड़ का हौसला तोड़ने चला है
पथ पर था जो वह पीछे छोड़ दिया है
वह नया इतिहास लिखने आगे चला है
वह बच्चा आज अपनी जिद पर अड़ा है
बहाने हजार तलाशता है
वह बच्चा बगले झांकता है
वह बच्चा बगले झांकता है
कई दिनों से न खाया है
कई रात बिन सोये गुजारा है
गालियों से उसने अपनी भूख मिटाई है
तपती सड़कों पर वह नंगे पैर चला है
वह बच्चा आज पहाड़ का हौसला तोड़ने चला है
पथ पर था जो वह पीछे छोड़ दिया है
वह नया इतिहास लिखने आगे चला है
वह बच्चा आज अपनी जिद पर अड़ा है
बहाने हजार तलाशता है
वह बच्चा बगले झांकता है
शनिवार, 4 मार्च 2017
मैं बढूंगा अपने पथ की ओर
उसने मुझसे कहा था
जिस पथ पर मैं कदम रखूँ
वह पथ स्वर्ग की ऒर जाएगा
आज यहीं सोच निकला हूँ अकेला
कि आज मैं अपने पथ पर जाऊंगा
फिर उन राहों में
क्यों न पतझड़ हो, गर्मी का अहसास हो, चमकते गरजते सावन के बादल हों, एक माँ से बिछड़ा हुआ एक बच्चे का बचपन हो, वो जो खेतों में दूसरों की भूख मिटाने को हल जोतता है।
मैं बढूंगा अपने पथ की ऒर। एक सतत प्रयास के साथ पथ पर चलूँगा पथ पर चलूँगा...
जिस पथ पर मैं कदम रखूँ
वह पथ स्वर्ग की ऒर जाएगा
आज यहीं सोच निकला हूँ अकेला
कि आज मैं अपने पथ पर जाऊंगा
फिर उन राहों में
क्यों न पतझड़ हो, गर्मी का अहसास हो, चमकते गरजते सावन के बादल हों, एक माँ से बिछड़ा हुआ एक बच्चे का बचपन हो, वो जो खेतों में दूसरों की भूख मिटाने को हल जोतता है।
मैं बढूंगा अपने पथ की ऒर। एक सतत प्रयास के साथ पथ पर चलूँगा पथ पर चलूँगा...
मंगलवार, 31 जनवरी 2017
रात जैसे ठहरी थी सुबह के इंतजार में
रात जैसे ठहरी थी सुबह के इंतजार में
साखों पर ओस थी पिघलने के इंतजार में
हम घर से न निकले आपके इंतजार में
बक बक करने को जुबां थी इंतजार में
चलती रही घड़ी की सुई समय के इंतजार में
हम रुके नहीं खो जाने के इंतजार में
साखों पर ओस थी पिघलने के इंतजार में
हम घर से न निकले आपके इंतजार में
बक बक करने को जुबां थी इंतजार में
चलती रही घड़ी की सुई समय के इंतजार में
हम रुके नहीं खो जाने के इंतजार में
शनिवार, 28 जनवरी 2017
आखिर ए कैसा बाजार?
सेक्स इच्छा की कमी या मन न करना। शुक्राणुओं का कम या कमजोर होना बनना ऐसी लाइन एक दो नीं अनगिनत हैं। न्यूज चैनल से लेकर पारिवारिक शो चैनल और अखबारों में आए दिन देखे जाने वाले विज्ञापनों में आपको दिख जाएंगे। पता नहीं हम किस समाज में जी रहे हैं और रही सही कसर इन विज्ञापनों में लड़कियों का इस्तेमाल करके पूरी कर दी जाती है।
अगर आपको अपना प्रचार करना ही है तो बहुत से तरीके हैं। विज्ञापनदाता इसमें बदलाव कर अपनी बात पहुंचा सकता है। अब विज्ञापना की इसमें क्या गलती, गलती वो बेचारे चैनल और अखबारों वालों की है, अब उनकी क्या गलती है उनको भी तो विज्ञापनों से पैसा कमाना है तो वो क्यों इस पर आपत्ति ले। आखिर में वो एक लाइन में इसमें जोड़ जरूर देते हैं विज्ञापन के संबंध में आप खुद जिम्मेदार होंगे। बेचारे अखबार वाले और विज्ञापन वाले, चैनल वाले कौन दोषी? एक प्रोडक्ट बेचने के लिए ऐसी पंच लाइनों का प्रयोग और ऊपर से लगा दी महिला की फोटो, रही-सही कसर वह भी पूरी हो जाती है।
आखिर ए कैसा बाजार है? जहां समाज, संस्कार धरे के धरे रह जाते हैं सिर्फ पैसा ही हमे दिखता है। चाहे किसी प्रोडक्ट की बात हो, फिल्म की बात हो या फिर राजनीति की कोई इससे अछूता नहीं, आखिर ऐसा क्यों? ऐसे न जाने कितने सवाल है जो बाजार से ताल्लुक रखते हैं। आखिर हम-आप भी दोषी हैं कहीं न कहीं ऐसे बाजारों को माहौल देकर।
अगर आपको अपना प्रचार करना ही है तो बहुत से तरीके हैं। विज्ञापनदाता इसमें बदलाव कर अपनी बात पहुंचा सकता है। अब विज्ञापना की इसमें क्या गलती, गलती वो बेचारे चैनल और अखबारों वालों की है, अब उनकी क्या गलती है उनको भी तो विज्ञापनों से पैसा कमाना है तो वो क्यों इस पर आपत्ति ले। आखिर में वो एक लाइन में इसमें जोड़ जरूर देते हैं विज्ञापन के संबंध में आप खुद जिम्मेदार होंगे। बेचारे अखबार वाले और विज्ञापन वाले, चैनल वाले कौन दोषी? एक प्रोडक्ट बेचने के लिए ऐसी पंच लाइनों का प्रयोग और ऊपर से लगा दी महिला की फोटो, रही-सही कसर वह भी पूरी हो जाती है।
आखिर ए कैसा बाजार है? जहां समाज, संस्कार धरे के धरे रह जाते हैं सिर्फ पैसा ही हमे दिखता है। चाहे किसी प्रोडक्ट की बात हो, फिल्म की बात हो या फिर राजनीति की कोई इससे अछूता नहीं, आखिर ऐसा क्यों? ऐसे न जाने कितने सवाल है जो बाजार से ताल्लुक रखते हैं। आखिर हम-आप भी दोषी हैं कहीं न कहीं ऐसे बाजारों को माहौल देकर।
बुधवार, 25 जनवरी 2017
रहते हैं लाख बंदिशों में जो
सर झुक जाता है तेरी बंदगी में ऐ रब
फरेब का चादर ओढ़कर एक पल न चल पाता हूं
रहते हैं लाख बंदिशों में जो
ख्वाहिशों के झोंको में उड़ जाया करते हैं
तमन्नाएं छटपटाती हैं दिल के बंद दरवाजे के पीछे
दिल के दरवाजे के खुलने तक तमन्नाएं मर जाया करती है
हर रोज जिंदगी के कुछ पल मांगता हूं उस रब से जीने के
कुछ खोने के डर में ये पल बीत जाया करते हैं
फरेब का चादर ओढ़कर एक पल न चल पाता हूं
रहते हैं लाख बंदिशों में जो
ख्वाहिशों के झोंको में उड़ जाया करते हैं
तमन्नाएं छटपटाती हैं दिल के बंद दरवाजे के पीछे
दिल के दरवाजे के खुलने तक तमन्नाएं मर जाया करती है
हर रोज जिंदगी के कुछ पल मांगता हूं उस रब से जीने के
कुछ खोने के डर में ये पल बीत जाया करते हैं
शुक्रवार, 20 जनवरी 2017
न जाने कहां से आया
इतनी बेरहम थी दुनिया
मेरा दर्द न आंक सकी
कुछ पलों को वो साथ रही
फिर हमें वहीं छोड़कर चली गई
न तमाशा हुआ
न कोई शोरगुल हुआ
हम मिले अंजाने शहर में
उन अंजाने हाथों को पकड़ा
एक अंजाना ही सही
पर एक अपनापन दे गया
कुछ पल ही सही
कुछ हंसी दे गया
हमें वह हजारों सपने दिखा गया
इस बेरहम दुनिया में
न जाने कहां से आया
और एक दिन की तरह बीत सा गया
मेरा दर्द न आंक सकी
कुछ पलों को वो साथ रही
फिर हमें वहीं छोड़कर चली गई
न तमाशा हुआ
न कोई शोरगुल हुआ
हम मिले अंजाने शहर में
उन अंजाने हाथों को पकड़ा
एक अंजाना ही सही
पर एक अपनापन दे गया
कुछ पल ही सही
कुछ हंसी दे गया
हमें वह हजारों सपने दिखा गया
इस बेरहम दुनिया में
न जाने कहां से आया
और एक दिन की तरह बीत सा गया
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