सोमवार, 24 जुलाई 2017

न था मालूम माँ फिर न आऊंगा

पतझड़ बीता #सावन आया
बारिश के संग मेघों का आमंत्रण आया
पनघट से #पनिहारिन घर को आई
#बेटा जो #परदेसी हो गइल है
हर शाम माँ बेटे का इन्तजार करती है
घर से कहकर निकला था जल्दी आऊंगा
न था मालूम माँ फिर न आऊंगा
तुझसे जो कहकर आया था माँ
मैं वैसा न बन पाया था माँ
आने को जाने को अब #याद नहीं रहता #माँ
बस तुझको इक इक #पल याद करके जी लेता हूँ माँ

शुक्रवार, 16 जून 2017

क्या कभी सोचा है उनकी भी इक ज़िन्दगी होती

कभी सोचा है इक #उम्र ढलने के बाद क्या होता है उनका
वो जो #मज़बूरी में अपना #जिस्म बेचती हैंक्या कभी सोचा है उनकी भी इक ज़िन्दगी होतीकैसे उनको हीं समझा जाने लगता है
कैसे ज़िन्दगी जीती होंगी सोचा है तुमने
बस तुम तो #वासना की आग में जलते रहे हो
जिसने उस आग में दूसरों को जलाया
क्या कभी सोचा है उनकी भी इक ज़िन्दगी होती
बस तुम #लोगों ने वेश्या का नाम देकर उससे जीवन छीन लिया
और इस #दुनिया ने उसे #वेश्या से ज्यादा कुछ नहीं समझा

रविवार, 4 जून 2017

सहर ने सताया इक उम्र तक बहुत

चला था घर से कुछ पाने की चाह में
सफर में मैं अपना सबकुछ गवां बैठा
जो थे साये की तरह मेरे साथ
एक शक की वजह से गवां बैठा
अब बैठता हूँ बेंच के किनारे की जगह पर
अब बीच में बैठने में डर सताने लगा है
हवाओं के मिलन में अब खुशबू जो घुलती है
अब उन खुसबुओं से अपना रिश्ता गंवारा सा लगता है
सहर ने सताया है हमे इक उम्र तक बहुत
अब सहर छोड़कर हम सतायेंगे बहुत

शनिवार, 3 जून 2017

हमारी गली के मोड़ पर वो मकान आता है

#हमारी #गली के मोड़ पर वो #मकान आता है
निकलते हैं जब भी उनका #एहतराम आता है
#शर्म से #नज़रे झुका लेते हैं #उनको #देखकर
जब निकलते #वक्त वो अपनी #छत पर आता है

शनिवार, 22 अप्रैल 2017

आनंदित हो वह मधुमास में उड़ता रहा

आनंदित हो वह मधुमास में उड़ता रहा
वह परिंदा शहर-दर-शहर घुमता रहा
कुछ छोड़ा तो कुछ अपना लिया था हर शहर को
शहर छोड़ने पर वह परिंदा फड़फड़ा रहा था
लब्ज उसके कह रहे थे हर इक कहानी को
शहर छोड़ उड़ चलने की कहानी को
बस नए शहर की तलाश हर वक्त रहती है
न जाने क्यों उड़ने की बेकरारी सी रहती है

मंगलवार, 21 मार्च 2017

बहाने हजार तलाशता है

बहाने हजार तलाशता है
वह बच्चा बगले झांकता है
कई दिनों से न खाया है
कई रात बिन सोये गुजारा है
गालियों से उसने अपनी भूख मिटाई है
तपती सड़कों पर वह नंगे पैर चला है
वह बच्चा आज पहाड़ का हौसला तोड़ने चला है
पथ पर था जो वह पीछे छोड़ दिया है
वह नया इतिहास लिखने आगे चला है
वह बच्चा आज अपनी जिद पर अड़ा है
बहाने हजार तलाशता है
वह बच्चा बगले झांकता है 

शनिवार, 4 मार्च 2017

मैं बढूंगा अपने पथ की ओर

उसने मुझसे कहा था
जिस पथ पर मैं कदम रखूँ
वह पथ स्वर्ग की ऒर जाएगा
आज यहीं सोच निकला हूँ अकेला
कि आज मैं अपने पथ पर जाऊंगा
फिर उन राहों में
क्यों न पतझड़ हो, गर्मी का अहसास हो, चमकते गरजते सावन के बादल हों, एक माँ से बिछड़ा हुआ एक बच्चे का बचपन हो, वो जो खेतों में दूसरों की भूख मिटाने को हल जोतता है।
मैं बढूंगा अपने पथ की ऒर। एक सतत प्रयास के साथ पथ पर चलूँगा पथ पर चलूँगा...