रविवार, 2 दिसंबर 2018

मेरी तनहा ख्वाबों का वो भी एक सिला है


#जिंदगी के सफर का अपना ही मजा
कहीं ख़ुशी तो कहीं ग़मों का सिला है
मिलते मिलते कल तलक जिनसे
वो आज किसी और के गले में पड़ा है
सोच के हमने उसे कुछ और गले लगाया
मेरी तनहा #ख्वाबों का वो भी एक सिला  है
दर्द में ही अब मजा आता है
बिना दर्द के सब सूना सा लगता है

बुधवार, 28 नवंबर 2018

‌मेट्रो सिटी


‌यहाँ जिंदगी सिर्फ दौड़ती है। न यहाँ न कोई अपने से खुश है न दूसरे की ख़ुशी में शरीक होना चाहता है। रात होते ही प्रेमी युगल यहाँ दिखाना आम बात है। पर सच प्रेम सिर्फ उनकी कामनाओं तक सीमित रहता है, जो आज किसी और के साथ तो कल किसी और के साथ होता है। यहाँ प्रेमिका और प्रेम एक छलावा है जो सिर्फ अपनी महत्वाकांक्षा और अपनी जरूरत के अनुसार बदलता है। यहाँ चमड़ी की कीमत तक लगती है वो भी मजबूरी में नहीं अपनी इच्छाओं की पूर्ति के
‌ लिए। यहाँ ग्रुपों पर सब उपलब्ध है। घुटनों से नीचे तक कपड़े कम ऊपर ज्यादा रहते हैं। ऊंची ऊंची बिल्डिंगों में रातों को महफ़िल सजती है फिर बजती भी सुरीली रातों में। सिगरेट की कश मारतीं  युवतियां और शाम ढले पुरुष मित्र के साथ चेस करती शराब के ग्लास के युवतियां खूब मिलेंगी।
‌चेहरे की खूबसूरती भी आँखों का धोखा भी हो सकता है। 

रविवार, 25 नवंबर 2018

राधे का प्रेम

श्रीहरि:
“उद्धव काका!!!....मुझे आज आपसे कुछ पूछना है..... ये बताइए....मेरी १६१०८ माताओं में... किसने पिता जी के ह्रदय में सबसे प्यारा स्थान प्राप्त किया है???” प्रद्युम्न जी ने अपने सोलहवें जन्मदिन पर उद्धव जी से पूंछा...

बताइए न...उद्धव काका!!!.... मुझे पता है...इस प्रश्न का हल.... केवल आपके पास ही होगा...” उद्धव जी के शांत ही रहने पर प्रद्युम्न उनसे जिद्द करने लगे....

उद्धव जी बड़ी ही दुविधा में फंस गए... आखिर वे प्रद्युम्न को कैसे बताएं ...की उसके प्रश्न का हल...उसकी १६१०८ माताओं से भी परे है...

उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा... “उनमे से किसी को भी नहीं....कृष्ण के ह्रदय का सबसे प्यारा स्थान तो किसी और को ही प्राप्त है... वे कृष्ण की स्वामिनी ...श्री राधा रानी हैं...”

“क्या??? श्री राधा रानी???.... ये कौन हैं???....काका...!!!” प्रद्युम्न जी आश्चर्य चकित होने के साथ साथ कुछ नाराज़ भी हुए...

“हाँ वत्स!!... ब्रज की एक बाला.....एक गोपी....श्री राधे....अब मै तुम्हे बताता हूँ की वे कौन हैं... और कैसे वे कृष्ण को सर्वाधिक प्रिय हैं....” उद्धव जी बोले...

एक बार की बात है....तुम्हारे पिता जी की तबियत इतनी बिगड़ गयी...की कोई भी वैध उनका इलाज़ कर पाने को सफल ना हुआ... और हम सब को लगने लगा...की ये हमारा कृष्ण के साथ आखिरी समय हो सकता है... “ उद्धव जी उस घटना को याद करते करते व्याकुल हो गए....

प्रद्युम्न ने उन्हें कुछ जल दिया और पूंछा... “फिर काका???”

उद्धव जी ने आगे बताया.... “द्वारकाधीश ने स्वयं अपने इलाज़ का उपाय बताया... और सबसे उनका वह उपाय करने को पूंछा..... लेकिन तुम्हे पता है प्रद्युम्न .....१६१०८ रानियों में कोई भी उनका वह उपाय करने को राजी ना हुआ...जिस से भगवान् कृष्ण ठीक हो सकते थे... उनमे से कोई भी वह उपाय करके बड़े पाप का जिम्मेदार नहीं बनना चाहता था.....”

प्रद्युम्न ये सुनकर आश्चर्य में पड़ गए... “फिर पिता जी के प्राण किसने बचाए...काका???...जल्दी बताइए...”

“श्रीराधे ने....प्रद्युम्न....!!!.... वो श्री राधे ही थीं....जिन्होंने उस बड़े पाप का जिम्मा अपने सर लिया... और यही प्रमाण है....की वे कृष्ण को सर्वाधिक प्रिय हैं...जो उन्होंने कृष्ण के प्राणों की रक्षा के लिए... आपना लोक-परलोक सब न्योछावर कर दिया....”उद्धव जी ने प्रसन्न होकर बताया...

“आखिर पिता जी ने ऐसा कौन सा उपाय बताया था...काका...??? जो ब्रज की वो बाला ही कर सकी.... और जिसे करने का साहस ...पाप से बचने के लिए मेरी किसी माता ने नही किया... ???” प्रद्युम्न ने आँखों मजाल भरकर पूंछा....

उद्धव जी ने श्री राधे के कमल-चरणों का ध्यानं करते हुए आँखें बंद कर ली...और बताया... “अपने चरणों का जल!!!....प्रद्युम्न... श्रीकृष्ण ने अपनी किसी भक्त के धूल भरे चरणों का जल ही अपनी बिमारी का उपाय बताया था ...और श्री राधे ने ही अपना चरणामृत पाप की परवाह किये बिना... भगवान् कृष्णा को पीने के लिए भेज दिय था....अब तुम्ही बताओ....भला किसी और को कृष्ण के ह्रदय में सबसे प्यारा स्थान कैसे प्राप्त हो सकता है???”

प्रद्यम्न जी श्री राधारानी की जय जय कार करते हुए.... उनके दर्शन को....वृन्दावन को भाग चले....

प्रेम तो बंधनमुक्त कर देता है


प्रेम निष्कपट, निश्छल और यदि भावपूर्ण तो वह इंसान को पूरी तरह से स्वतंत्र कर देता है। उसमें फिर किसी भी तरह का बंधन नहीं होता और न ही किसी भी चीज की लालसा रहती है। वह अनंत काल में स्वतंत्र हो जाता है।
प्रेम न रूप देखता है न धन—धान्य देखता और न ही उसको प्रेम के सिवाय कुछ सामने वाले से पाने की इच्छा रहती है।
प्रेम तो एक होता है, लेकिन लोग उसे दो इंसान की जिस्मों को जोड़कर देखता है। उसे नहीं पता होता है कि प्रेम का मतलब ही एक होना उसमें दो का सवाल ही नहीं उठता है।
प्रेम होने पर ईश्वर का भी आशीर्वाद मिलता है। जैसे बच्चे को अपनी मां से पहला प्रेम होता है उसके बाद बहन—बंधु और प्रेमिका से हो सकता है, लेकिन क्या प्रेम हमेशा पाने की इच्छा से होता है तो कतई नहीं।
प्रेम होने पर किसी प्रकार का मोह, माया ग्रसित नहीं कर सकती है, वह तो प्रेम होने पर और भी आनंदित रहने लगता है, क्योंकि जो अभी तक वह अपूर्ण रहता है प्रेम उसे पूर्ण कर देता है। और वह पूर्णानंद में डूब जाता है।
प्रेम को बल अथवा धन से नहीं पाया जा सकता है। प्रेम को तो प्रेम से ही पाया जा सकता है।

सोमवार, 19 नवंबर 2018

कभी कभी खुद के लिए मुस्कुरा लिया करो


तुम अपनी अच्छाई रख लो
हम अपनी बुराई रख लेते
मिलो तो कुछ दिल की भी बता दिया करो
सारी जलन सिर्फ सिगरेट पर मत निकल दिया करो
अगर मानते हो हमें अपना हमनवी तो हमसे भी कुछ बता दिया करो
माना की हम उनमें नहीं नहीं हो सकते
पर दुश्मन समझ कर ही गरिया दिया करो
अंदर से जो समंदर दबाये बैठे हो
साथ बैठे तो उसे दरिया बना दिया करो
ठीक है तुम्हे हमारी किसी मोड़ पर जरूरत न पड़े
पर एक तिनके की तरह याद तो रख लिया करो
माना तुम्हारे अपने  बहुत से सिद्धांत है
पर कभी सिद्धांतों से हटकर भी चल लिया करो
ये जो सभी की ख़ुशी के खातिर सारा जहर खुद पीते हो
कभी कभी खुद के लिए मुस्कुरा लिया करो

सोमवार, 1 अक्टूबर 2018

यहां पर है धरती का देवलोक


कल्‍पना कीजिए कि आप ऐसी जगह पर हों जहां चहुंओर उजाला ही दिखे और दिन व रात में अंतर करना आपके के लिए मुश्किल हो जाए तो समझ लीजिए की आप भगवान शंकर की नगरी काशी में हैं । साथ ही गंगा तट पर उतरे देवलोक की छवि कैसी होती होगी। हमारी कल्‍पना से भी सुंदर । देव दीपावली देखने के लिए देश ही नहीं विदेशों से भी पर्यटक काशी पहुंचते हैं । पर्यटक यहां की रीति रिवाजों को उम्र भर के लिए कैद कर लेना चाहते हैं । उल्‍लेखनीय है कि दिवाली के 15 दिन बाद कार्तिक पूर्णिमा पर देव दीपावली के दिन गंगा के घंटों को सजाया जाता है । काशी में गंगा के घाटों पर दीपों का अद़भुत जगमग प्रकाश देवलोक का निर्माण कर देता है । यह उत्‍सव काशी की मुख्‍य पहचान बन गया है

गुरुवार, 23 अगस्त 2018

काश वो मिलते और शुक्रिया कह सकता

अमावस की रात थी और उसकी आंखों से जैसे कुछ टपक रहा था मैंने उसे बहुत देखने की कोशिश की लेकिन उस अमावस की रात में इतना अंधेरा था कि शायद ही मैं उसका चेहरा देख पाता अब बस कुछ ही देर बचे थे हमारी बस को आने में और मैं अपने मोबाइल में व्‍यस्‍त था इतनी देर में बस आई और मैं चल दिया हमें क्‍या पता था कि जिस शहर में मैं घूमने आया हूं वह हमें कुछ देने को आतुर है हां लेकिन बस की लाइट में मैंने चलते चलते उसके चेहरे को आखिर बार देखा था मैं अपने गांव आ गया बाकि रोज की तरह सब चलने लगा फिर एक दिन हमारे मोबाइल पर काल आई अजनबी सी आवाज मैंने पूछा किससे बात करनी है जवाब मिला रिषभ से इतना सुनते ही मैं चौंक गया फिर मैंने कहा हां रिषभ बोल रहा हूं और हमारा नंबर आपको कहां से मिला उसने कहा कि जब आप दिल्‍ली आए थे और बस का इंतजार कर रहे थे उसी बगल की सीट पर मैं बैठी थी आप तो चले गए लेकिन अपने पर्स को सीट पर ही भूल गए जब मैं घर को चल रही थी तभी मेरी नजर आपकी सीट पर पडी यहां आपका पर्स पडा था मैंने उसमें देखा तो आपके जरूरी कागज थे तो हमने सोचा आपके दिए पते पर कोरियर कर दूं और आपको बता दूं बस यही बताने के लिए फोन किया था कि आपका पर्स भेज दिया और उसने फोन रख दिया फोन कटते ही मैं कुछ देर तक सोचता रहा अजनबी शहर में ऐसे भी लोग होते हैं आज मैं सोचता हूं उनसे मुलाकात होती तो उनका शुक्रिया अदा कर पाता