अमावस की रात थी और उसकी आंखों से जैसे कुछ टपक रहा था मैंने उसे बहुत देखने की कोशिश की लेकिन उस अमावस की रात में इतना अंधेरा था कि शायद ही मैं उसका चेहरा देख पाता अब बस कुछ ही देर बचे थे हमारी बस को आने में और मैं अपने मोबाइल में व्यस्त था इतनी देर में बस आई और मैं चल दिया हमें क्या पता था कि जिस शहर में मैं घूमने आया हूं वह हमें कुछ देने को आतुर है हां लेकिन बस की लाइट में मैंने चलते चलते उसके चेहरे को आखिर बार देखा था मैं अपने गांव आ गया बाकि रोज की तरह सब चलने लगा फिर एक दिन हमारे मोबाइल पर काल आई अजनबी सी आवाज मैंने पूछा किससे बात करनी है जवाब मिला रिषभ से इतना सुनते ही मैं चौंक गया फिर मैंने कहा हां रिषभ बोल रहा हूं और हमारा नंबर आपको कहां से मिला उसने कहा कि जब आप दिल्ली आए थे और बस का इंतजार कर रहे थे उसी बगल की सीट पर मैं बैठी थी आप तो चले गए लेकिन अपने पर्स को सीट पर ही भूल गए जब मैं घर को चल रही थी तभी मेरी नजर आपकी सीट पर पडी यहां आपका पर्स पडा था मैंने उसमें देखा तो आपके जरूरी कागज थे तो हमने सोचा आपके दिए पते पर कोरियर कर दूं और आपको बता दूं बस यही बताने के लिए फोन किया था कि आपका पर्स भेज दिया और उसने फोन रख दिया फोन कटते ही मैं कुछ देर तक सोचता रहा अजनबी शहर में ऐसे भी लोग होते हैं आज मैं सोचता हूं उनसे मुलाकात होती तो उनका शुक्रिया अदा कर पाता
गुरुवार, 23 अगस्त 2018
शुक्रवार, 23 मार्च 2018
हां मैं वेश्या हूं, हां मैं वेश्या हूं
हां मैं #वेश्या हूं, हां मैं वेश्या हूं
तुम जैसे रोज आते हैं मेरे #कोठे पर अपनी #हवस
मिटाने
कुछ मानसिक विक्रतियों से घिरे तो कुछ अपना
दर्द भुलाने
एक नहीं तुम जैसे अनेक के साथ रोज हम बिस्तर
होती हूं
हम सिर्फ अपना जिस्म बेचती हूं और तुम हर
रोज अपनी आत्मा बेंच कर जाते हो
माहवारी में भी तुम जैसे दर्द को नहीं समझ
पाते और हम उसे दवा की तरह पी जाती हूं
मेरे यहां धर्मों का आडम्बर नहीं होता
कोठे के बाहर सारे धर्म छूट जाते हैं
मेरे यहां एक से आते हैं जिनकी औकात एक
ग्राहक सी होती है
और फिर जाते जाते वेश्या गाली भी दे जाते होगुरुवार, 14 सितंबर 2017
हिंदी खुद को लड़ता पाती है
कौन धरा पर यह किसको भाति है
हिंदी की बिंदी खुद अपना #अस्तित्व बचाती है
जिस #जुबान पर #मॉम से पहले #माँ आती है
ऐसे देश में हिंदी खुद को लड़ता पाती है
#फ़िल्मी #दुनिया हिंदी से ही #मालामाल बनती है
पर इन #फिल्मकारों को हिंदी बोलने में शर्म महसूस होती है
#विद्या धन आलय में जिससे पैसा आये वह #भाषा प्यारी है
#अमेरिका, #जापान, #चीन अपनी #मातृभाषा पर इतराते हैं
इक भारतवासी हैं जो #हिंदीवासी कहलाने में लज्जित महसूस करते हैं
बड़े बड़े #लेख छपे #अखबारों में
हमने आज सुना है हिंदी का भी दिन होता है हिंदी वालों में
गर्व से कहो हम हिंदीवासी हैं
हिंदी की बिंदी खुद अपना #अस्तित्व बचाती है
जिस #जुबान पर #मॉम से पहले #माँ आती है
ऐसे देश में हिंदी खुद को लड़ता पाती है
#फ़िल्मी #दुनिया हिंदी से ही #मालामाल बनती है
पर इन #फिल्मकारों को हिंदी बोलने में शर्म महसूस होती है
#विद्या धन आलय में जिससे पैसा आये वह #भाषा प्यारी है
#अमेरिका, #जापान, #चीन अपनी #मातृभाषा पर इतराते हैं
इक भारतवासी हैं जो #हिंदीवासी कहलाने में लज्जित महसूस करते हैं
बड़े बड़े #लेख छपे #अखबारों में
हमने आज सुना है हिंदी का भी दिन होता है हिंदी वालों में
गर्व से कहो हम हिंदीवासी हैं
सोमवार, 24 जुलाई 2017
न था मालूम माँ फिर न आऊंगा
पतझड़ बीता #सावन आया
बारिश के संग मेघों का आमंत्रण आया
पनघट से #पनिहारिन घर को आई
#बेटा जो #परदेसी हो गइल है
हर शाम माँ बेटे का इन्तजार करती है
घर से कहकर निकला था जल्दी आऊंगा
न था मालूम माँ फिर न आऊंगा
तुझसे जो कहकर आया था माँ
मैं वैसा न बन पाया था माँ
आने को जाने को अब #याद नहीं रहता #माँ
बस तुझको इक इक #पल याद करके जी लेता हूँ माँ
बारिश के संग मेघों का आमंत्रण आया
पनघट से #पनिहारिन घर को आई
#बेटा जो #परदेसी हो गइल है
हर शाम माँ बेटे का इन्तजार करती है
घर से कहकर निकला था जल्दी आऊंगा
न था मालूम माँ फिर न आऊंगा
तुझसे जो कहकर आया था माँ
मैं वैसा न बन पाया था माँ
आने को जाने को अब #याद नहीं रहता #माँ
बस तुझको इक इक #पल याद करके जी लेता हूँ माँ
शुक्रवार, 16 जून 2017
क्या कभी सोचा है उनकी भी इक ज़िन्दगी होती
कभी सोचा है इक #उम्र ढलने के बाद क्या होता है उनका
वो जो #मज़बूरी में अपना #जिस्म बेचती हैंक्या कभी सोचा है उनकी भी इक ज़िन्दगी होतीकैसे उनको हीं समझा जाने लगता है
कैसे ज़िन्दगी जीती होंगी सोचा है तुमने
बस तुम तो #वासना की आग में जलते रहे हो
जिसने उस आग में दूसरों को जलाया
क्या कभी सोचा है उनकी भी इक ज़िन्दगी होती
बस तुम #लोगों ने वेश्या का नाम देकर उससे जीवन छीन लिया
और इस #दुनिया ने उसे #वेश्या से ज्यादा कुछ नहीं समझा
वो जो #मज़बूरी में अपना #जिस्म बेचती हैंक्या कभी सोचा है उनकी भी इक ज़िन्दगी होतीकैसे उनको हीं समझा जाने लगता है
कैसे ज़िन्दगी जीती होंगी सोचा है तुमने
बस तुम तो #वासना की आग में जलते रहे हो
जिसने उस आग में दूसरों को जलाया
क्या कभी सोचा है उनकी भी इक ज़िन्दगी होती
बस तुम #लोगों ने वेश्या का नाम देकर उससे जीवन छीन लिया
और इस #दुनिया ने उसे #वेश्या से ज्यादा कुछ नहीं समझा
रविवार, 4 जून 2017
सहर ने सताया इक उम्र तक बहुत
चला था घर से कुछ पाने की चाह में
सफर में मैं अपना सबकुछ गवां बैठा
जो थे साये की तरह मेरे साथ
एक शक की वजह से गवां बैठा
अब बैठता हूँ बेंच के किनारे की जगह पर
अब बीच में बैठने में डर सताने लगा है
हवाओं के मिलन में अब खुशबू जो घुलती है
अब उन खुसबुओं से अपना रिश्ता गंवारा सा लगता है
सहर ने सताया है हमे इक उम्र तक बहुत
अब सहर छोड़कर हम सतायेंगे बहुत
सफर में मैं अपना सबकुछ गवां बैठा
जो थे साये की तरह मेरे साथ
एक शक की वजह से गवां बैठा
अब बैठता हूँ बेंच के किनारे की जगह पर
अब बीच में बैठने में डर सताने लगा है
हवाओं के मिलन में अब खुशबू जो घुलती है
अब उन खुसबुओं से अपना रिश्ता गंवारा सा लगता है
सहर ने सताया है हमे इक उम्र तक बहुत
अब सहर छोड़कर हम सतायेंगे बहुत
शनिवार, 3 जून 2017
हमारी गली के मोड़ पर वो मकान आता है
#हमारी #गली के मोड़ पर वो #मकान आता है
निकलते हैं जब भी उनका #एहतराम आता है
#शर्म से #नज़रे झुका लेते हैं #उनको #देखकर
जब निकलते #वक्त वो अपनी #छत पर आता है
निकलते हैं जब भी उनका #एहतराम आता है
#शर्म से #नज़रे झुका लेते हैं #उनको #देखकर
जब निकलते #वक्त वो अपनी #छत पर आता है
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