बुधवार, 1 अप्रैल 2020

मुझसे मिलने आना तो रंजिश छोडकर आना मेरे दोस्त

मुझसे मिलने आना तो रंजिश छोडकर आना मेरे दोस्त
अगर दिल गवाही न दे तो कतई न आना
बस याद कर लेना शाम की वो घडी कि हम दोनों साथ हैं
हम दोनों की गलतफहमी ने दिल की दूरी दी बढा दी है
दोनों इस बात से तकल्लुम करते हैं
कि एक के बिना दूसरा कुछ नहीं है
अब हम जब जा रहे हैं इस दुनिया से दोस्त
तो यादों को दिल से डिलीट कर देना
पता हम दोनों के लिए को यह आसान नहीं है
पर दोनों को जीने के लिए यह आसान कर देगा
हां, अब जब हम दोबारा से मिलेंगे तो एक मुक्तसर जिंदगी जीएंगे
उन्हीं को एक अहसास की तरह समेट लेंगे
आना हो तो आना जरूर
हम मिलेंगे वहीं पर जहां पहली दफा मिले

नोट : #तकल्लुम मतलब #बातचीत
#मुक्त्सर मतलब #संक्षेप, #छोटा

शनिवार, 28 मार्च 2020

लौटेंगे हम भी अपने गाँव को


लौटेंगे हम भी अपने गाँव को
अभी शहर का गुरूर देखना है
कभी गुजारी थी गाँव में अल्हड़ वाली ज़िन्दगी
अब हर एक शहर में हम बस किरायेदार हैं
है यहाँ की बहुत रंगीनी दुनिया
पर रंगीनियों पर हर दर्द भारी है
शहर को गाँव से बेहतर समझ के दूर हुए
शहरों की दौलत पर रिश्तों की डोर भारी है

शुक्रवार, 20 मार्च 2020

झूठ को आओ बरगलाया जाए

झूठ को आओ बरगलाया जाए 
गम को भुलाकर मुस्‍कुराया जाए 
हम और तुम में कितने दिन जीयेंगे 
आओ हंसकर ये वक्‍त गुजारा जाए

सोमवार, 24 फ़रवरी 2020

कपोल भीग जाते हैं

कपोल भीग जाते हैं
पर आँख तर नहीं होती
जीने को दौड़ता हूँ
पर दौड़ नहीं होती
सिसकियाँ लेकर सो जाता हूँ
सिसकियों में विवेक नहीं होती

शुक्रवार, 29 नवंबर 2019

प्रेम करिये मोल भाव नहीं

#प्रेम को लोग दो जिस्मों से जोड़ते हैं, जबकि वो तो एक है। #शरीर, #रूप, #रंग #पैसे, #पद, #प्रतिष्ठा और बहुत सारे हैं पर प्रेम जी कर देखें। प्रेम तो आनंद जो अनन्त है और जब #आपको प्रेम होगा तो #खुद ब खुद अंदर से एक #अनुभूति होगी, जो आपको हर पल #महसूस होगी। बस प्रेम करिये #मोल #भाल न करिये। प्रेम होगा तो प्रेम ही होगा।
बोलो #राधे राधे

गुरुवार, 7 फ़रवरी 2019

मैं पथिक बस सफर का हूं



मैं पथिक बस सफर का हूं
हां मुझमें चंचलता भी है और धैर्य
शताब्‍दी तक मुझमें जीने की पिपासा नहीं
बस इक पल में सारी उम्र जीना चाहता हूं
खुले मन वाला हूं
जो तुम्‍हें पसंद आए वो पथिक हूं
खुद के अंदर इक दुनिया बसाए बैठा हूं
हर रोज मिलता हूं उनमें रहने वालों से
कुछ दो चार अपने टाइप के भी हैं
कुछ दिलनशीं कुछ दिलदार भी हैं
सफर में खुशनुमा पल समेट कर चलता हूं
चलता हूं तो सर झुका के चलता हूं
आज इक सफर में हूं
शायद कल भी सफर में रहूं

शुक्रवार, 21 दिसंबर 2018

हाँ पागल हो गया हूँ


यूं तो मंजिल के सफर में मुसाफिर पागल होता है, और उसे कोई पागल समझाता है तो उससे बड़ा पागल कोई नहीं होता है।
रात में उठ-उठकर जागना और फिर एक बेचैन हो जाना, फिर कुछ क्षणभर बाद लेट जाना, लेकिन आँखें मूंदने पर भी लक्ष्य सपना बनकर आने पर फिर उठ जाना और अपने कमरे में कहीं पड़ी किताबों को खोजना, गूगल, बिंग, विकीपीडिया और सोशल मीडिया के जरिये अपने लक्ष्य तक पहुंचने का प्रयत्न करना तो आप कह सकते हो मैं पागल हो गया, हां खुद भी स्वीकार करता हूं, क्योंकि हर क्षण, हर स्थान और हर व्यक्ति में लक्ष्य को खोजने लगता हूँ। इस पर लोग मुझे पागल समझने लगते हैं, हाँ काफी हद तक सच भी, क्योंकि उनकी निगाहों में पागल हूँ और मैं अपनी नजर में पागलपन के उस स्तर तक जाना चाहता हूँ जहाँ लोगों की बातों का मुझपर कोई फर्क नहीं पड़ेगा, हाँ मैं बोलता भी कम लेकिन उनकी बातों को मैं नजर अंदाज कभी करता और जो हमारे लक्ष्य में उनकी बातें सहायक हैं उनको मैं ग्रहण कर लेता हूं। कह सकते हैं आप की मुझे अपने लक्ष्य से मोहब्बत हो गई इस कारण मुझे किसी और से मोहब्बत नहीं होती । मुझे कोई भी वस्तु अब लक्ष्य से इतनी तुच्छ लगने लगी है कि उसके सिवा कुछ नजर नहीं आता।
आप मुझे हाँ पूरी तरह से पागल कह सकते और खुद से दूर भी रख सकते हैं , लेकिन आखिर में कहना चाहता हूँ, हाँ मैं पागल हो गया और ये पागलपन तब तक रहेगा बनाये रखना चाहता हूँ, लक्ष्य मिलने तक।
पगालों का न ठौर है न ठिकाना है
वो निकले हैं इस कदर घर से
कि पाने को लक्ष्य पागलपन से परे जाना हैं