होली आहें
फाल्गुन की भरी दोपहरी मैं मुलुल उइ देख रहे जब निकली पिचकारी से रंगों की धारा तो उइ खटिया पर से डोली रहे वो देख कै अपनी धोती कुर्ता कै हालात उइ चिल्लाय पड़े इय बुजरउ हमरी धोती कुर्ता मैं का दाल्दिन्ही इतनन मैं लरिकवा चिल्लाय परा भागौ बाबू जी इय फाल्गुनी होली की पिचकारी आहैं
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