बुधवार, 13 जुलाई 2016

तेरी #याद ने

तेरी याद ने
       मुझे उस खूंटी तक खींच लाई
जहां वर्षों पहले हमने झोला टांगा था
       झोला उठाके हमने
उसमें से वो किताब निकाली
      जिसमें तुमने गुलाब दबाकर दिया था
गुलाब देखकर
     अन्तस मन से एक ही आवाज निकली
जहां भी रहो बस मुस्कुराती रहे

#मुर्दा जब बोल पड़ा

मृत्यु शय्या पर लेटा
 मुर्दा जब बोल पड़ा
तब समाज नाम की आंखों में
शर्म नाम की चीज दिखी
कुछ घंटों पहले जब उसको
 निर्वस्त्र कर नहलाया जा रहा था
हर उम्रदराज प्रत्यक्षदर्शी बन देख रहे थे
 जब प्रत्यक्ष ही मुर्दा बोल पड़ा
तब समाज की सारी कुंठाएं जीवित हो उठीं
मुर्दा जब समाज में अपने को पाया
फिर समाज की कुंठाओं में
 खुद को घिरता पाया
रोज ही वो अब इस समाज में
रेला पेला जाता है
फिर से ही वो खुद को
 मृत्यु शय्या पर पाता है


रविवार, 10 जुलाई 2016

जब #बेटी बोझिल सी लगने लगे

जब बेटी बोझिल सी लगने लगे
जब बेटी से युवती बनने लगे
देखो समाज कैसे तंस कसता
आंखे फाड़-फांड़कर देखता
जब बेटी को खुद को सुरक्षित न पाती
तब समाज कलंकिनी कलमुही कहता
देखो समाज कैसे तंज कसता
ये समाज की देन है
बेटी खुद को कैसे करती
सिस-सिसकर खूब रोती
अपना दर्द खुद ही पी जाती
फिर भी एक मां बनकर
एक समाज को जन्म दे जाती
जब बेटी बोझिल सी लगने लगे

मंगलवार, 5 जुलाई 2016

हम सहज ही सबकुछ #भूल जाना चाहते थे

हम हैं तो तुम हो
तुम हो तो हम हैं
हम नहीं तो हमारी यादें हैं
तुम नहीं तो तुम्हारी यादें हैं
उस दिन तुमने क्या कहा था
जब हम चाय की चुस्कियां ले रहे थे
तुम्हारा आना हमारे लिए इत्तेफाक रहा
कभी किसी की बात पर अनायास हंसी निकल आती
तो कभी किसी की खिल्ली उड़ाई जाती
पर, सच में सबकी बातें निश्च्छल थीं
हम सब के हाथों में चाय की प्याली थी
और दिल में एक मीठी प्यास
बातें लम्बी थीं
इसीलिए बातों में वक्त का ठहराव था
हंसी दिन गुजर रहे थे
रोज कुछ नए दोस्त मिल रहे थे
पुराने भी बहुत याद आ रहे थे
गुजर दिन कुछ याद दिला रहे थे
आने वाले दिन कुछ सपने दिखा रहे थे
पता नहीं सपना था या स्वप्न
हम सहज ही सबकुछ भूल जाना चाहते थे
जैसे रेत पर बने पदचिह्न
जिसे लहर अपने में समा लेती है

गुरुवार, 30 जून 2016

कुछ ऐसी प्यारी मेरी #मां

तन मेरा कपड़ा ओढ़े
मन उसका हरसाए
कुछ ऐसी प्यारी मेरी मां
भूखी रहकर मुझे खिलाये
खुद भूखी सो जाए
कुछ ऐसी प्यारी मेरी मां
क्षमा शब्द है मेरी मां
सागर में करुणा जैसी मेरी मां
तूफानों में कश्ती जैसी लड़ती मेरी मां
कुछ ऐसी प्यारी मेरी मां
मौसम में बरखा है मेरी मां
ऋतुओं में वसंत ऋतु है मेरी मां
त्योहारों में ईद, दीवाली, वैसाखी है मेरी मां
कुछ ऐसी प्यारी मेरी मां
मेरी प्रथम शिवाला है मेरी मां
मेरे मन की अभिलाषा है मेरी मां
कुछ ऐसी प्यारी मेरी मां
मेरा बचपन मेरी मां
मेरा यौवन मेरी मां
कुछ ऐसी प्यारी मेरी मां
मेरी आंखे मेरी मां
मेरी सांसें मेरी मां
कुछ ऐसी प्यारी मेरी मां

बुधवार, 29 जून 2016

#दुर्योधन अट्टहांस कर #हंस रहा


एक कदम तू चल, एक कदम मैं चलूं हौसला तू भी रख, मै भी रखूं दुनिया में वक्त किसके पास है सबको जल्दी है एक-दूसरे की रोटी छीनने की पड़ी है सियासत के नाम पर सांप्रदायिक दंगे कराए जा रहे जो कल तक चिल्लाते थे एकता और राष्ट्रीयता आज वही हम लोगों में फूट डाल रहे हैं धर्म के नाम पर लोग बांटे जा रहे सियासत का सुख पाने को बाप किसी पार्टी में और बेटा किसी पार्टी में सांतवा वेतन आयोग लग गया और आमजनता आज भी दो रोटी के लिए शोषण का शिकार हो रही लोगों की नजरों में सिर्फ पैसा मायने रखने लगा अब घरों के आंगन में दीवाचलरें खड़ी होने लगी अब हर शहर हस्तिनापुर बनने की तट आ पहुंचा दुर्योधन अट्टहांस कर हंस रहा शकुनि मामा अपना पांसा फेंक रहा अब हर शहर कुरुक्षेत्र बनने की तट पर आ खड़ा हुआ पता नहीं अपना शहर क्या सपने देख रहा पता नहीं अपना शहर क्या सपने देख रहा


मंगलवार, 28 जून 2016

#ईश्वर को देखा नहीं हमने

मैं हूं कुछ नहीं
आप की तरह मुसाफिर हूं
आज यहां तो कल और कहीं ठिकाना है
पर जब भी मिलता हूं आप से
चेहरे पर मुस्कान खींच आती है
 पता नहीं ये क्यों होता है
हो सकता है हम और आप हर जनम में मिल रहे हों
जनम के साथ हम लोगों के मुखौटे बदल गए हों
पता नहीं क्यों आपकी आवाज सुनकर ऐसा लगता है जैसे
मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर और गुरुद्वारे से आवाज आई है
ईश्वर को देखा नहीं हमने
जब आपको देखता हूं, ईश्वर दिख जाता है
सूरज की किरणों के जैसे
आपकी मुख की लालिमा है
आपको सूरज समझकर प्रणाम करता हूं
आप जहां भी रहेंगे वहां की फिजा रोशन रहेगी
अंत में अपने घुटनों के बल बैठ गया
और आपको स्मरण कर विदा लेता हूं
ईश्वर! ईश्वर!